नई दिल्ली: देश की राजधानी दिल्ली की सियासत में एक बार फिर से जबरदस्त भूचाल आने के संकेत मिल रहे हैं। दिल्ली आबकारी मामला (Delhi Liquor scam) थमने का नाम नहीं ले रहा है और अब यह लड़ाई सिर्फ नीतिगत फैसलों या घोटालों के आरोपों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि सीधे तौर पर देश की न्यायपालिका (Judiciary) बनाम राजनीतिक साख की जंग में तब्दील हो चुकी है। दिल्ली शराब नीति घोटाले के गंभीर आरोपों से घिरे आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (Arvind-Kejriwal) सहित पार्टी के पांच शीर्ष नेताओं के खिलाफ शुरू हुई अदालत की अवमानना कार्यवाही (Contempt Hearing) पर कल यानी मंगलवार को दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) में एक बेहद महत्वपूर्ण और निर्णायक सुनवाई होने जा रही है।
इस हाई-प्रोफाइल मामले की गंभीरता को देखते हुए कानूनी गलियारों से लेकर राजनीतिक हलकों तक में बेचैनी साफ देखी जा सकती है। इस बार मामला केवल जांच एजेंसियों की कार्रवाई का नहीं है, बल्कि देश की सबसे बड़ी अदालतों में से एक के सम्मान को ठेस पहुंचाने के आरोपों से जुड़ा है।
अदालती सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, इस बेहद संवेदनशील मामले की कमान अब दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) के न्यायाधीश जस्टिस नवीन चावला की अध्यक्षता वाली बेंच के हाथों में है। कल होने वाली इस सुनवाई में कोर्ट तय करेगा कि क्या अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगियों के खिलाफ अवमानना के तहत कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाए या नहीं। इससे ठीक पहले, बीती 14 मई को इस मामले में एक अप्रत्याशित मोड़ आया था। उस दौरान मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की सिंगल बेंच ने इस मामले का संज्ञान लेते हुए एक बड़ा कदम उठाया था। अदालत ने अरविंद केजरीवाल के अलावा आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, दिल्ली सरकार के कैबिनेट मंत्री सौरभ भारद्वाज और विधायक दुर्गेश पाठक को अदालत की गरिमा को धूमिल करने के प्रयास में कारण बताओ नोटिस जारी किया था।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने इस मामले की गंभीरता और व्यक्तिगत हमलों को देखते हुए खुद को इस सुनवाई से पूरी तरह अलग कर लिया। उन्होंने मामले को किसी दूसरी पीठ के समक्ष स्थानांतरित करने की सिफारिश की थी। लेकिन हटते-हटते उन्होंने जो टिप्पणियां कीं, उसने देश की लोकतांत्रिक और न्यायिक व्यवस्था के भीतर चल रही एक खतरनाक कशमकश को उजागर कर दिया।
जस्टिस शर्मा ने बेहद कड़े शब्दों में आगाह किया था कि अगर इस तरह से संवैधानिक संस्थाओं और अदालत के फैसलों को निशाना बनाने वाले आरोपितों पर सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो समाज में पूरी तरह से अराजकता (Anarchy) फैल जाएगी। उन्होंने कहा कि जब किसी न्यायिक संस्था को ही सार्वजनिक तौर पर कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है और उसे एक 'ट्रायल' से गुजरना पड़ता है, तो यह हर जज का परम कर्तव्य बन जाता है कि वह इन बाहरी दबावों, राजनीतिक नैरेटिव और सोशल मीडिया के शोर-शराबे से प्रभावित हुए बिना केवल और केवल संविधान के दायरे में रहकर काम करे।
मामले की तह में जाएं तो यह अवमानना कार्यवाही (Contempt Hearing) किसी सामान्य बहस का नतीजा नहीं है। अदालत को जांच के दौरान यह पता चला कि पूर्व मुख्यमंत्री और उनके सहयोगियों की ओर से विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बकायदा पत्र लिखकर और वीडियो बनाकर एक व्यापक और सुनियोजित डिजिटल कैंपेन (Social Media Campaign) चलाया गया था। यह कोई आम जनता की प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि इसे बहुत बड़े स्तर पर जानबूझकर सर्कुलेट किया गया था ताकि अदालत की छवि को आम लोगों की नजरों में गिराया जा सके।
जस्टिस शर्मा के अनुसार, यह एक बेहद संगठित और सुनियोजित तरीके से तैयार किया गया अभियान था। इसका मुख्य उद्देश्य यह था कि जो कानूनी प्रक्रिया और बहस अदालत के बंद कमरों के भीतर चल रही थी, उसके समानांतर एक भ्रामक और झूठी कहानी (Parallel Narrative) अदालत के बाहर जनता के बीच परोसी जा सके, जिससे न्यायपालिका (Judiciary) की निष्पक्षता पर सवाल उठाए जा सकें।
जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अपने दर्द और न्यायिक मर्यादा को बयां करते हुए कहा था कि एक जज के रूप में उन्हें कानून के तहत हमेशा निष्पक्ष आलोचना और वैचारिक असहमति को पूरे सम्मान के साथ स्वीकार करने की ट्रेनिंग मिली है। लोकतंत्र में हर किसी को असहमति का अधिकार है। लेकिन इस मामले में जो कुछ हुआ, वह आलोचना की सीमा को पार कर गया था। सोशल मीडिया पर चलाए गए इस गंदे खेल के जरिए न केवल किसी एक व्यक्तिगत जज की साख को निशाना बनाया गया, बल्कि पूरी की पूरी न्याय प्रणाली पर ही सवालिया निशान खड़े कर दिए गए।
अदालत ने इस बात पर भी गहरी चिंता जताई कि इस तरह के एजेंडे को हवा देने वाले और समानांतर नैरेटिव चलाने वाले कुछ लोगों के पास बहुत बड़ी राजनीतिक शक्ति भी हासिल है, जिसका इस्तेमाल वे संस्थाओं को दबाने के लिए कर रहे हैं। इस अभियान के तहत अदालत की कार्यवाही के हिस्सों को तोड़-मरोड़कर, वीडियो को संपादित (Edited Videos) करके इंटरनेट पर वायरल किया गया।
न्यायाधीश ने दोटूक शब्दों में कहा कि जब उन्होंने इस मामले में अपना कानूनी फैसला सुनाया था, तब आरोपितों के पास देश की सर्वोच्च अदालत यानी उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) जाने का पूरा और वैध कानूनी विकल्प मौजूद था। एक सभ्य समाज में कानून से असंतुष्ट लोग ऊपरी अदालत का रुख करते हैं, लेकिन इन नेताओं ने वो रास्ता चुनने के बजाय जजों के खिलाफ सोशल मीडिया पर व्यक्तिगत कीचड़ उछालने और नैरेटिव बनाने का घटिया रास्ता चुना।
अदालत के भीतर और बाहर के दोहरे रवैये को उजागर करते हुए जस्टिस शर्मा ने कहा था कि अदालत के कमरे के भीतर तो अरविंद केजरीवाल बड़े ही आदर और सम्मान के साथ कहते हैं कि वे देश की न्यायपालिका (Judiciary) का पूरा आदर करते हैं, लेकिन जैसे ही वे अदालत से बाहर जाते हैं, उनकी पूरी टीम अदालत और जजों के खिलाफ एक आक्रामक और अपमानजनक अभियान छेड़ देती है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी पहली और आखिरी ड्यूटी देश के पवित्र संविधान के प्रति है। जब इन आरोपितों ने अदालत को नीचा दिखाने का रास्ता चुना, तो अदालत को भी न्याय की रक्षा के लिए दूसरा कड़ा रास्ता अख्तियार करना पड़ा। गौरतलब है कि इससे पहले 20 अप्रैल को भी अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच से इस मामले की सुनवाई से हटने की मांग की थी, जिसे अदालत ने सिरे से खारिज कर दिया था। तब जस्टिस शर्मा ने अपने 34 साल के बेदाग न्यायिक करियर का हवाला देते हुए कहा था कि वे किसी भी बाहरी दबाव या झूठे आरोपों से प्रभावित हुए बिना अपना काम करती रहेंगी।
दिल्ली आबकारी मामला (Delhi Liquor scam) के तहत कल का दिन आम आदमी पार्टी के भविष्य के लिए बेहद भारी साबित होने वाला है। एक तरफ जहां अवमानना मामले में सुनवाई होगी, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) के ही एक अन्य जज जस्टिस मनोज जैन कल सीबीआई की उस मुख्य याचिका पर भी सुनवाई करने जा रहे हैं, जिसमें केंद्रीय जांच ब्यूरो ने अरविंद केजरीवाल समेत कुल 23 आरोपितों को निचली अदालत (Trial Court) द्वारा बरी किए जाने के आदेश को चुनौती दी है। सीबीआई का दावा है कि निचली अदालत ने सबूतों को नजरअंदाज कर इन आरोपितों को राहत दी थी, जिस पर हाईकोर्ट को तुरंत रोक लगानी चाहिए। ऐसे में कल होने वाली यह दोहरी कानूनी घेराबंदी दिल्ली की राजनीति में क्या नया मोड़ लेकर आती है, इस पर पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं।
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